संसार में भले असंख्य सुख दु:ख हों किंतु संतोष एक ही है, कि- अंतःकरण पर कोई बोझ ना हो. और किसी उपादान या परिग्रह से अंतर नहीं पड़ता, संसार की आँख में कौन कितना सुखी, सफल, सामर्थ्यवान है, इसमें भी सार नहीं. संसार की आँख तो छलना है. पर जिसकी आत्मा में ग्लानि का दंश हो तो उसके लिए फिर यह सब एक तरफ़ रह जाता है. जब रात को कोई सोने जाता है तो मन पर कौन सा बोझ लेकर जाता है? कौन सा पाप खटकता है? कौन सी बात कचोटती है? यही प्रश्न पूछने जैसे हैं. कोई अपने लिए खटता है या औरों के दु:खों से विषण्ण होता है? अपनी किस बात पर लज्जित होता है? होता भी है या नहीं? हर किसी को लज्जा नहीं आती, सब कोई में आत्मचिंतन नहीं होता. पर इससे जिसमें है उसे मुक्ति नहीं मिल जाती, उसके लिए यह अभिमान का प्रयोजन नहीं बनता. उसे तो अपना दायित्व-निर्वाह करना ही है. एक भूल जिसे अब सुधारा ना जा सकता हो, पूरा जीवन आत्मा में कील की तरह चुभने को बहुत है. पछतावा दु:ख के साथ मिलकर और सघन हो जाता है, उससे दु:ख की टीस गहरा जाती है. उसकी कसक बड़ी करुण होती है. यों दु:ख से अंतर्तम निर्मल ही होता है. बड़े से बड़ा दु:ख सहकर आत्मा उ...
वंदनीय डॉ. आंबेडकर की पवित्र स्मृति देशभक्त महान राष्ट्रीय नेता एवंभारतरत्न डा० बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी की 129 वीं जयंती पर ह्रार्दिक शुभकामनाएं । अभिवादन करना मैं अपना स्वभाविक कर्तव्य समझता हूं। उन्होंने स्वर्ण समाज की ‘छुओ मत’ प्रवृत्ति से निर्मित रूढ़ियों पर कठोर प्रहार किए और समाज की पुनर्रचना करने का आह्वान किया। कष्ट तथा अपमानित जीवन बिताने वाले समाज के बहुत महत्वपूर्ण वर्ग के लिए डॉ. आंबेडकर ने सम्मान का जीवन जीना संभव बनाया। उनके इस कार्य के द्वारा राष्ट्र पर जो महान उपकार किया गया उसका ऋण उतारना संभव नहीं है।’ कदम-कदम पर उनके विचारों का अनुसरण करने की आवश्यकता है. उनका जीवन प्रेरणा देने वाला है. उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रासंगिक बातों का विचार न कर दीर्घकालिक विचार करते हैं, ऐसे ही व्यक्ति महामानव कहलाते हैं. बाबा साहेब ने समाज में अधिकारों के लिये तो संघर्ष किया, लेकिन वर्ग संघर्ष को बढ़ावा नहीं दिया. उनके लिये राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा. समाज से विद्रोह नहीं किया तथा अनुयायियों को सही दिशा दिखाई, यह उनके जीवन की विशेषता रही. उन्होंने समता, स्वातंत्र व बंध...