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भोजन की बर्बादी


भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है, क्योंकि एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्योहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखे लोगों द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। भोजन की लूटपाट जहां मानवीय त्रासदी है, वहीं भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन भोजन की बर्बादी एक विडंबना है। एक आदर्श समाज रचना की प्रथम आवश्यकता है कि अमीरी-गरीबी के बीच का फासला खत्म हो।

शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। होटलों में भी हम देखते हैं कि काफी मात्रा में भोजन जूठन के रूप में छोड़ा जाता है। 1-1 शादी में 300-300 आइटम परोसे जाते हैं, खाने वाले व्यक्ति के पेट की एक सीमा होती है, लेकिन हर तरह के नए-नए पकवान एवं व्यंजन चख लेने की चाह में खाने की बर्बादी ही देखने को मिलती है। इस भोजन की बर्बादी के लिए न केवल सरकार बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं।



भारतीय संस्कृति में जूठन छोड़ना पाप माना गया है। दूसरी ओर यहां तो अन्न को देवता का दर्जा प्राप्त है लेकिन तथाकथित धनाढ्य मानसिकता के लोग अपनी परंपरा एवं संस्कृति को भूलकर यह पाप किए जा रहे हैं। सब अपना बना रहे हैं, सबका कुछ नहीं। और उन्माद की इस प्रक्रिया में खाद्यान्न संकट, भोजन की बर्बादी एवं भोजन की लूटपाट जैसी खबरें आती हैं, जो हमारी सरकार एवं संस्कृति पर बदनुमा दाग हैं।

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