संसार में भले असंख्य सुख दु:ख हों किंतु संतोष एक ही है, कि- अंतःकरण पर कोई बोझ ना हो. और किसी उपादान या परिग्रह से अंतर नहीं पड़ता, संसार की आँख में कौन कितना सुखी, सफल, सामर्थ्यवान है, इसमें भी सार नहीं. संसार की आँख तो छलना है. पर जिसकी आत्मा में ग्लानि का दंश हो तो उसके लिए फिर यह सब एक तरफ़ रह जाता है. जब रात को कोई सोने जाता है तो मन पर कौन सा बोझ लेकर जाता है? कौन सा पाप खटकता है? कौन सी बात कचोटती है? यही प्रश्न पूछने जैसे हैं. कोई अपने लिए खटता है या औरों के दु:खों से विषण्ण होता है? अपनी किस बात पर लज्जित होता है? होता भी है या नहीं? हर किसी को लज्जा नहीं आती, सब कोई में आत्मचिंतन नहीं होता. पर इससे जिसमें है उसे मुक्ति नहीं मिल जाती, उसके लिए यह अभिमान का प्रयोजन नहीं बनता. उसे तो अपना दायित्व-निर्वाह करना ही है. एक भूल जिसे अब सुधारा ना जा सकता हो, पूरा जीवन आत्मा में कील की तरह चुभने को बहुत है. पछतावा दु:ख के साथ मिलकर और सघन हो जाता है, उससे दु:ख की टीस गहरा जाती है. उसकी कसक बड़ी करुण होती है. यों दु:ख से अंतर्तम निर्मल ही होता है. बड़े से बड़ा दु:ख सहकर आत्मा उजली ही होती है. क्योंकि दु:ख का आलम्बन मुझमें नहीं, मैं केवल दुःख भोगता हूं. रोग तो ग्लानि है. जिसके सामने अपना अपराध झलक गया, उसकी लम्बी यंत्रणा है. अपराध की चेतना ऐसी वस्तु है, जिसे नष्ट करना कठिन है. जिसे स्वयं से छुपाना दुष्कर है. बड़ी सिद्धि की बात है, बुरा करके अपने को अपने से बचा ले जाना. अंतःकरण निकलंक रखकर पूरा जीवन जी जाना : इसके सिवा कोई और प्रयोजन नहीं. यही साध्य है. कोई और क्या करता है, उससे क्या? वो उसका तत्व है. वो ही जाने. स्वयं को ही देखना है, स्वयं को ही साधना है. हर किसी ने यही करना है. संसार में धूप-चाँदनी की तरह रहना है. यहाँ पर हैं पर यहाँ के नहीं हैं. जहाँ जाना है वहाँ की सोचना है. धूप मैली नहीं होती, चाहे जितनी धूल उड़ती हो. चाँदनी पर दाग़ नहीं लगता, चाहे रात में जितनी कालिमा. वैसा मन लेकर यहाँ रहना है, जितने दिन रहना है. करुणा दु:ख का उपहार है. पछतावा ग्लानि का. जीवन में और कोई वस्तु संचय करने योग्य नहीं.
भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है, क्योंकि एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्योहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखे लोगों द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। भोजन की लूटपाट जहां मानवीय त्रासदी है, वहीं भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन भोजन की बर्बादी एक विडंबना है। एक आदर्श समाज रचना की प्रथम आवश्यकता है कि अमीरी-गरीबी के बीच का फासला खत्म हो। शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। होटलों में भी हम देखते हैं कि काफी मात्रा में भोजन जूठन के रूप में छोड़ा जाता है। 1-1 शादी में 300-300 आइटम परोसे जाते हैं, खाने वाले व्यक्ति के पेट की एक सीमा होती है, लेकिन हर तरह के नए-नए पकवान एवं व्यंजन चख लेने की चाह में खाने की बर्बादी ही देखने को मिलती है। इस भोजन की बर्बादी के लिए न केवल सरकार बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। भारतीय संस...
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