अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असंतोष की अभिव्यक्ति की भी अनुमति देता है परंतु सफ़ल लोकतन्त्र एवं राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए नैसर्गिक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का होना आवश्यक है। जिस समाज में स्वतन्त्रतापूर्वक विचारों की अभिव्यक्ति न हो सके, उस समाज पर अनैतिकता का शासन हो जाता है ।वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के आधार पर एक समाज स्वतन्त्र रूप से विकसित हों सकता है । भारत के वर्तमान परिदृश्य में स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता परिलक्षित होती है । देश के सर्वाधिक बौद्धिक परिवेश वाले जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय ( जेएनयू ) में देश के टुकड़े करने और भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने के नारों को बुलंद करने वालों पर संविधान के दायरे में की गयी कार्यवाही को यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना जाता है तो इस प्रकार के प्रतिबन्ध राष्ट्र की अस्मिता और अखंडता के लिए अपरिहार्य है । सामाजिक नियन्त्रण के अभाव में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता जानलेवा बीमारी के अतिरिक्त और कुछ नहीं । सामाजिक नियन्त्रण के तत्वों में नैतिक मूल्य, धर्म, साहित्य, शिक्षा, क़ानून और लोक प्रथाओँ आदि को शामिल किया जाता हैं । समाज विज्ञानी रॉबर्ट के मर्टन कहते हैं कि “अगर समाज के नियमों पर वैयक्तिक इच्छाएं हावी हो जाएँ तो सामाजिक व्यवहार में अनेक विसंगतियाँ उत्पन्न हो जाएंगी । ये विसंगतियाँ समाज में अनुशासनहीनता, अपराध व विद्रोह पैदा करती हैं।”
किसी राजनीतिक लाभ या वर्ग विशेष के तुष्टीकरण के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ढाल बनाना राष्ट्र के लिए घातक है जो कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में आज सामान्य बात हों गयी है |
समाज में किसी भी अनैतिक और अमानवीय कार्य को सही नहीं ठहराया जा सकता है परंतु रोहित बेमुला की आत्महत्या से लेकर पंसारे, कलबुर्गी और अख़लाक़ तक की हत्या की घटनाओं पर सम्मान वापसी कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा बताने वाले साहित्यकार ,लेखक और पत्रकार राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र मोहित चौहान की आत्महत्या, केरल में संघ कार्यकर्ताओं की जघन्य हत्याएं , जून-2015 में मस्जिद के पास बस का हॉर्न बजाने पर धर्म विशेष के लोगों द्वारा बस ड्राइवर रमेश की पीट-पीटकर हत्या , अगस्त में मेरठ के पास हरदेवनगर में ऐसी ही उन्मादी भीड़ द्वारा लड़की से छेड़छाड़ का विरोध करने पर सेना के जवान वेदमित्र चौधरी की हत्या, इसी वर्ष मार्च में मुस्लिम लड़की से विवाद करने पर बिहार के हाजीपुर में एक हिन्दू युवक की हत्या और इरूल (आंध्र),पश्चिमी भांडुप (मुम्बई), मुजफ्फरनगर और कोसीकलां (उत्तरप्रदेश) में भी इसी तरह विशेष समुदाय के लोगों के समूह द्वारा हिन्दू युवकों की पीट-पीटकर हत्या पर 'साहित्यकारों' ने सम्मान नहीं लौटाए, क्यों ? आम आदमी भी साफतौर पर देख पा रहा है कि यह साहित्यकारों की राजनीति है । कुछ खास किस्म के साहित्यकारों का 'पॉलिटिकल स्टैंड' । आज भारत में यूरोप से आयातित मार्क्सवादी बौद्धिक आन्दोलन की विदाई होती दीख रही है । इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर यही बौद्धिक वर्ग अपनी साख बचाने का प्रयास कर रहा है और मीडिया में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रोपोगेन्डा का निर्माण कर रहा है । आज जब विश्व नव विचारों व स्वसंस्कृति के आधार पर प्रगति के मार्ग पर अग्रसारित है, भारत भी स्वसंस्कृति के आलम्बन पर ही प्रगति की ओर निहार रहा है । भारत में पश्चिमी मानसिकता और संस्कृति के पक्षधर किसी भी कीमत पर ऐसा होने देना नहीं चाहते हैं । इसलिए बौद्धिक सामाजिक आन्दोलन का नाम देकर भारतीय संस्कृति विरोधी दल भारत सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं । कोई इतिहास बदलने का विरोध कर रहा है तो किसी को सनातनी संस्कृति का उभार रास नहीं आ रहा है । पंथनिरपेक्षता के नाम पर साहित्यकारों का एक समूह राष्ट्रवादी विचार धारा का परोक्षतः खण्डन करता नज़र आ रहा है ।सामाजिक असन्तुलन और विघटनकारी तत्वों को रोकने के लिए असामाजिक तत्वों पर अवश्य ही ऐसे प्रतिबन्धों की आवश्यकता हैं। सुप्रीम कोर्ट की मत है कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच संतुलन कायम करना सरकार की जिम्मेदारी है । सरकारें खुद तय करें कि यह काम कैसे किया जाए ? ऐसे में राष्ट्र को खंडित करने और सांप्रदायिकता की आग को बढ़ाने वाली किसी भी अभिव्यक्ति को न्यायोचित नही ठहराया जा सकता | इस प्रकार के कृत्यों को अंजाम देने वाले सभी स्वरों को प्रतिबंधित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा नहीं अपितु राष्ट्र की अस्मिता की दृष्टि से आवश्यक हैं |
किसी राजनीतिक लाभ या वर्ग विशेष के तुष्टीकरण के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ढाल बनाना राष्ट्र के लिए घातक है जो कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में आज सामान्य बात हों गयी है |
समाज में किसी भी अनैतिक और अमानवीय कार्य को सही नहीं ठहराया जा सकता है परंतु रोहित बेमुला की आत्महत्या से लेकर पंसारे, कलबुर्गी और अख़लाक़ तक की हत्या की घटनाओं पर सम्मान वापसी कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा बताने वाले साहित्यकार ,लेखक और पत्रकार राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र मोहित चौहान की आत्महत्या, केरल में संघ कार्यकर्ताओं की जघन्य हत्याएं , जून-2015 में मस्जिद के पास बस का हॉर्न बजाने पर धर्म विशेष के लोगों द्वारा बस ड्राइवर रमेश की पीट-पीटकर हत्या , अगस्त में मेरठ के पास हरदेवनगर में ऐसी ही उन्मादी भीड़ द्वारा लड़की से छेड़छाड़ का विरोध करने पर सेना के जवान वेदमित्र चौधरी की हत्या, इसी वर्ष मार्च में मुस्लिम लड़की से विवाद करने पर बिहार के हाजीपुर में एक हिन्दू युवक की हत्या और इरूल (आंध्र),पश्चिमी भांडुप (मुम्बई), मुजफ्फरनगर और कोसीकलां (उत्तरप्रदेश) में भी इसी तरह विशेष समुदाय के लोगों के समूह द्वारा हिन्दू युवकों की पीट-पीटकर हत्या पर 'साहित्यकारों' ने सम्मान नहीं लौटाए, क्यों ? आम आदमी भी साफतौर पर देख पा रहा है कि यह साहित्यकारों की राजनीति है । कुछ खास किस्म के साहित्यकारों का 'पॉलिटिकल स्टैंड' । आज भारत में यूरोप से आयातित मार्क्सवादी बौद्धिक आन्दोलन की विदाई होती दीख रही है । इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर यही बौद्धिक वर्ग अपनी साख बचाने का प्रयास कर रहा है और मीडिया में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रोपोगेन्डा का निर्माण कर रहा है । आज जब विश्व नव विचारों व स्वसंस्कृति के आधार पर प्रगति के मार्ग पर अग्रसारित है, भारत भी स्वसंस्कृति के आलम्बन पर ही प्रगति की ओर निहार रहा है । भारत में पश्चिमी मानसिकता और संस्कृति के पक्षधर किसी भी कीमत पर ऐसा होने देना नहीं चाहते हैं । इसलिए बौद्धिक सामाजिक आन्दोलन का नाम देकर भारतीय संस्कृति विरोधी दल भारत सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं । कोई इतिहास बदलने का विरोध कर रहा है तो किसी को सनातनी संस्कृति का उभार रास नहीं आ रहा है । पंथनिरपेक्षता के नाम पर साहित्यकारों का एक समूह राष्ट्रवादी विचार धारा का परोक्षतः खण्डन करता नज़र आ रहा है ।सामाजिक असन्तुलन और विघटनकारी तत्वों को रोकने के लिए असामाजिक तत्वों पर अवश्य ही ऐसे प्रतिबन्धों की आवश्यकता हैं। सुप्रीम कोर्ट की मत है कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच संतुलन कायम करना सरकार की जिम्मेदारी है । सरकारें खुद तय करें कि यह काम कैसे किया जाए ? ऐसे में राष्ट्र को खंडित करने और सांप्रदायिकता की आग को बढ़ाने वाली किसी भी अभिव्यक्ति को न्यायोचित नही ठहराया जा सकता | इस प्रकार के कृत्यों को अंजाम देने वाले सभी स्वरों को प्रतिबंधित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा नहीं अपितु राष्ट्र की अस्मिता की दृष्टि से आवश्यक हैं |
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