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अधिकार एव कर्तव्य

आज हम सभी जगह अधिकारों के लिए मचा हुआ कोलाहल सुनते है !हमारे सभी राजनितिक दल भी समान अधिकारों की बात बोलते हुए हमारे लोगो में अहं भाव जागृत कर रहे है |कही भी कर्तव्य और निस्वार्थ भाव की सेवा पर कोई बल नही दिया जाता |स्वकेंद्रित अधिकार _ज्ञान के वायु मंडल में सहयोग की भावना ,जो समाज की आत्मा होती है , जीवित नही रह सकती |इसी कर्ण आज हम अपने राष्ट्र जीवन में विधिक घटकों के मध्य संघर्ष देख रहे है चाहे वे अध्यापक हो छात्र हो या श्रमिक और उद्योगपति |केवल सभी अपने अधिकारों के लिए लडे जा रहे हे , किसी को भी अपने कर्तव्य  याद नही है , ना ही कोई याद कराना चाहता है और ना कोई याद करना चाहता है |
भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्ररा गाँधी जी ने कहा था : अधिकार तभी पूर्ण हो सकते है जब कर्तव्य  निभाए\ जाये , परन्तु आज सभी इस देश में खुद को पिछड़ा घोषित करने पर तुले है उसका मात्र एक कारण की अपने कर्तव्य ना करने पड़े | जिस देश का युवा पिछड़ा बनने के लिए संघर्ष रत हो उस देश की उन्नती तो इश्वर ही मालिक हैं \
देश का  समावेशी विकास सरकार नही समाज करता है जिसमे सरकार सहयोग करती है सहयोग का रूप औआर्थिक बी भोतिक देश\ काल परिस्थियों के अनुसार हो सकता है ,
हम सभी को  भारत के शक्तिशाली सम्विधान ने जहा एक मूल अधिकार दिए है , वही दूसरी ओर मूल कर्तव्य भी , पर सभी सुविधा के अनुसार अब सम्विधान का सदुपयोग करने लगे है , यही हम सभी को और देश समाज को क्षरण की ओर लेकर जाएगी |

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