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Showing posts from April, 2018

कभी कभी अलविदा का अर्थ रुक जाना होता हैं

वो जब तुमसे कहे कि आज के बाद बात नहीं करूंगा  तुम फिऱ भी बात न करना , वो जब कहे कि आज के बाद वो तुमसे नहीं मिलेगा तो तुम हंसी में उड़ा देना , पर जब वो आख़िरी बार तुम्हारे लौट आने का इंत...

भोजन की बर्बादी

भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है, क्योंकि एक तरफ विवाह-शादियों, पर्व-त्योहारों एवं पारिवारिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर भूखे लोगों द्वारा भोजन की लूटपाट देखने को मिल रही है। भोजन की लूटपाट जहां मानवीय त्रासदी है, वहीं भोजन की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन भोजन की बर्बादी एक विडंबना है। एक आदर्श समाज रचना की प्रथम आवश्यकता है कि अमीरी-गरीबी के बीच का फासला खत्म हो। शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। होटलों में भी हम देखते हैं कि काफी मात्रा में भोजन जूठन के रूप में छोड़ा जाता है। 1-1 शादी में 300-300 आइटम परोसे जाते हैं, खाने वाले व्यक्ति के पेट की एक सीमा होती है, लेकिन हर तरह के नए-नए पकवान एवं व्यंजन चख लेने की चाह में खाने की बर्बादी ही देखने को मिलती है। इस भोजन की बर्बादी के लिए न केवल सरकार बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। भारतीय संस...

लोकतंत्र

राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थाई नही बन सकता जब तक कि उसके मूल्य में सामाजिक लोकतंत्र नही हो | सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है ? इसका अर्थ है वह जीवन  शेली  जो स्वाधीनता समानता तथा भाईचारा को मान्यता देती हो स्वाधीनता सामनता तथा भाईचारे को एक अलग त्रयी के रूप नही देखा जाना चाहिए ,ये तीनो मिलकर  एक एसी रचना करते है  की इन तीनो में से किसी एक को भी लग कर दिया जाये तो लोकतंत्र के मूल्य ही समाप्त हो जायेगे ,और मूल्य ही समाप्त होते ही उसका व्यापक उद्देश संकुचित हो जायेगा , स्वाधीनता को सामनता से नही अलग किया जा सकता उसी प्रकार स्वधीनता और समानता को बन्धुत्व से भी अलग नही किया जा सकता है , समानता के अभाव में स्वाधीनता से कुछ का आधिपत्य अनेक पर स्थापित होने की स्थिति बनेगी स्वाधीनता बिना समनाता के वैयक्तिक फल अथवा उद्यम को समाप्त कर देगी |

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असंतोष की अभिव्यक्ति की भी अनुमति देता है  परंतु सफ़ल लोकतन्त्र एवं राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए नैसर्गिक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का होना आवश्यक है। जिस समाज में स्वतन्त्रतापूर्वक विचारों की अभिव्यक्ति न हो सके, उस समाज पर अनैतिकता का शासन हो जाता है ।वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के आधार पर एक समाज स्वतन्त्र रूप से विकसित हों  सकता है । भारत के वर्तमान परिदृश्य में स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता परिलक्षित होती है । देश के सर्वाधिक बौद्धिक परिवेश वाले जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय  ( जेएनयू ) में देश के टुकड़े करने और भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने के नारों को बुलंद करने वालों पर संविधान के दायरे में की गयी कार्यवाही को यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना जाता है तो इस प्रकार के प्रतिबन्ध राष्ट्र की अस्मिता और अखंडता के लिए अपरिहार्य है । सामाजिक नियन्त्रण के अभाव में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता जानलेवा बीमारी के अतिरिक्त और कुछ नहीं । सामाजिक नियन्त्रण के तत्वों में नैतिक मूल्य, धर्म, साहित्य, शिक्षा, क़ानून और लोक...

अधिकार एव कर्तव्य

आज हम सभी जगह अधिकारों के लिए मचा हुआ कोलाहल सुनते है !हमारे सभी राजनितिक दल भी समान अधिकारों की बात बोलते हुए हमारे लोगो में अहं भाव जागृत कर रहे है |कही भी कर्तव्य और निस्वार्थ भाव की सेवा पर कोई बल नही दिया जाता |स्वकेंद्रित अधिकार _ज्ञान के वायु मंडल में सहयोग की भावना ,जो समाज की आत्मा होती है , जीवित नही रह सकती |इसी कर्ण आज हम अपने राष्ट्र जीवन में विधिक घटकों के मध्य संघर्ष देख रहे है चाहे वे अध्यापक हो छात्र हो या श्रमिक और उद्योगपति |केवल सभी अपने अधिकारों के लिए लडे जा रहे हे , किसी को भी अपने कर्तव्य  याद नही है , ना ही कोई याद कराना चाहता है और ना कोई याद करना चाहता है | भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्ररा गाँधी जी ने कहा था : अधिकार तभी पूर्ण हो सकते है जब कर्तव्य  निभाए\ जाये , परन्तु आज सभी इस देश में खुद को पिछड़ा घोषित करने पर तुले है उसका मात्र एक कारण की अपने कर्तव्य ना करने पड़े | जिस देश का युवा पिछड़ा बनने के लिए संघर्ष रत हो उस देश की उन्नती तो इश्वर ही मालिक हैं \ देश का  समावेशी विकास सरकार नही समाज करता है जिसमे सरकार सहयोग करती है ...

संस्कृति

संसार में कई धर्म है. हर एक धर्म के अनुयायियों के लिए उनका अपना धर्म वैसे ही सर्वश्रेष्ठ तथा प्रियतम होता है जेसे हर एक अपनी माँ . विभिन्न धर्मो की तुलना सभी को अप्रिय तथा अव्यवहार्य प्रतीत होती है , इधर कुछ समय से देश में जो माहोल बना उसे कही तक भारत की शांति प्रिय निति को चोट पहुची .  उसका प्रमुख कारण रहा देश के अंदर शांति स्थापित ना हो पाना .भारत की संस्कृति सर्व धर्म समभाव की रही है ,किन्तु इस सभी सी अधिक अति विशाल सर्वकष संकल्पना संस्कृति की है . राष्ट्र का प्राण संस्कृति ही हुआ करती है .  स्वामी विवेकानन्द ने कहा था की किसी  राष्ट्र को समाप्त करना है तो उस राष्ट्र की संस्कृति  को निर्मुल कर दो . एक संस्कृति का अभाव रहा और राष्ट्रीयता के युरोपिंन विद्वानों द्वारा मान्य शेष सभी संगटक विधमान रहे , तो भी राष्ट्र नही बन सकता , ग्रीस रोम मिश्र आदि राष्ट्र समाप्त  हुए तो इसका अर्थ यह नही तह कि इन देशो में निवास करने वाले समाप्त या नष्ट हो गए. वहा रहने वाले लोग तो जीवित थे ,किन्तु उनकीं संस्कृति नष्ट हो चुकी थी , इस कारण यह कहा गया कि वे  राष्ट्र ही नष्...