संसार में कई धर्म है. हर एक धर्म के अनुयायियों के लिए उनका अपना धर्म वैसे ही सर्वश्रेष्ठ तथा प्रियतम होता है जेसे हर एक अपनी माँ . विभिन्न धर्मो की तुलना सभी को अप्रिय तथा अव्यवहार्य प्रतीत होती है , इधर कुछ समय से देश में जो माहोल बना उसे कही तक भारत की शांति प्रिय निति को चोट पहुची .
उसका प्रमुख कारण रहा देश के अंदर शांति स्थापित ना हो पाना .भारत की संस्कृति सर्व धर्म समभाव की रही है ,किन्तु इस सभी सी अधिक अति विशाल सर्वकष संकल्पना संस्कृति की है . राष्ट्र का प्राण संस्कृति ही हुआ करती है .
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था की किसी राष्ट्र को समाप्त करना है तो उस राष्ट्र की संस्कृति को निर्मुल कर दो .
एक संस्कृति का अभाव रहा और राष्ट्रीयता के युरोपिंन विद्वानों द्वारा मान्य शेष सभी संगटक विधमान रहे , तो भी राष्ट्र नही बन सकता , ग्रीस रोम मिश्र आदि राष्ट्र समाप्त हुए तो इसका अर्थ यह नही तह कि इन देशो में निवास करने वाले समाप्त या नष्ट हो गए. वहा रहने वाले लोग तो जीवित थे ,किन्तु उनकीं संस्कृति नष्ट हो चुकी थी , इस कारण यह कहा गया कि वे राष्ट्र ही नष्ट हो गये .
अब भारत संकृति जो की समानता ,नम्रता , उदारता का प्रतीक है , इस की बचा के रखना हम सब की जिम्मेदारी ही नही क्र्तुव्य भी है .
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